Monday, 22 February 2016

2020[Hindi Story] Nayi shuruwat नई शुरुआत

आज फिर से एक नए दिन की शुरूआत हुई. जिस तरह तेज़ बारिश के बाद सब कुछ साफ़ हो जाता है उसी तरह बहुत सारी बातें साफ़ हो गयीं,दिल के मैल भी साफ़ हो गए और रिश्तों का एक नया ही प्रारूप सामने आया| 6
हम कब मिले कहाँ मिले अब इससे क्या सरोकार, किन हालात में मिले ये बात ज़्यादा मायने रखती है|
कहने को तो इंसान कुछ भी कह ले पर ये तो सहने वाला इंसान ही बता सकता है कि वो किस दर्द से गुज़रा है|
कुछ इसी दर्द से वो भी गुज़र रहा था उस रोज़। जाने क्या बात थी लाख पूछने पर भी किसी को बताने से गुरेज़ कर रहा था। मेरे वहां पहुँचते ही एकदम से खड़ा होकर वो मेरी ओर आया...
"प्रिया प्लीज़! इस नासूर को जल्दी से मेरे जिस्म से अलग कर दो,मुझसे अब और नहीं सहा जाता।"
"लेकिन इसमें अभी बहुत समय है रोहन! समय से पहले इसे निकालने से तुम्हारी जान को ख़तरा हो सकता है!" मैंने उसे समझाते हुए कहा।
"इस तरह दर्द में जान जाने से तो अच्छा है कि वैसे ही जान चली जाए.तुम कुछ करो ना प्लीज़!" वो दर्द से कराहते हुए बोला।
"अच्छा तुमने पेन किलर ली थी?" मैंने उसका ध्यान बँटाने की कोशिश की.
"तुम्हे लगता है कि अब पेन किलर से कुछ होगा?"
"होता नहीं तो मैं देती ही क्यूँ ?"
"मैं कुछ नहीं जानता बस अब तुम इसे किसी तरह निकाल दो..आज ही"
"रोहन मैं ऐसा नही कर सकती तुम समझते क्यों नहीं? अच्छा ठीक है...तुम आज और मेडिसिन्स ले लो फिर मैं कल देखती हूँ "
मैंने उसे फिर से समझाया और प्रिस्किप्शन लिस्ट में थोड़ा चेंज करके दवा लिख दी लेकिन मुझे पता था अब इससे कोई फ़ायदा नहीं होना। वो चला गया था और मैं बीते हुए दिनों में खो गई.

कभी किसी से मतलब ना रखने वाली,अपनी ही दुनिया में खोई रहने वाली मैं पता नही क्यों उस रोज़ बेवजह ही उससे झगड़ गयी।
"तुम हटो और अपना सामान भी हटाओ! मैं क्यूँ हटाऊँ अपना बैग? वैसे भी ये मेरी बर्थ है!"
" यार! मेरी बर्थ वेटिंग में है अभी बस थोड़े टाइम की तो बात है एडजस्ट कर लो ना थोड़ी देर! पड़ोसी होने के नाते इतना तो कर ही सकती हो,टी.टी.आता है तो मैं कर लूँगा कोई जुगाड़!"
"पड़ोसी माय फ़ुट! उस दिन जब मेरी स्कूटी खराब हुई थी तो तुमने हेल्प की थी मेरी? हाय! कैसे घसीटते हुए ले गयी थी मैं घर तक उसे...हटो!हटो! अभी के अभी हटो यहाँ से"
"प्रिया समझा करो वो तुम्हारे घर के सामने ही तो खराब हुई थी,फ़ौरन ही तो ले गयी थीं तुम उसे....और मैं इंटरव्यू के लिए भी तो लेट हो रहा था उस वक़्त कैसे हेल्प करता.. और फिर ये मत भूलो तुमने सिर्फ़ मुझे जाते हुए देखा था हेल्प नही मांगी थी मुझसे!"

"हौ! हे भगवन! कितना बड़ा झूठा है ये! तो क्या करती?तुम्हारे सामने हाथ जोड़ती पैर पड़ती??"

"देखो प्रिया! अब उन बातों से कोई फायदा नहीं। और फिर वो अपनी कॉलोनी थी,ये ट्रेन है..वहां तुम अपने घर जा सकती थीं यहाँ मैं कहाँ जाऊंगा?"
"कहीं भी जाओ पर मेरी बर्थ से अपने शरीर का बोझ हटाओ!"
"ओके!" 
वो उठा और और अपना सामान समेट कर वहां से जाने लगा तो अचानक ही उसका मायूस चेहरा देखकर मेरी मरी हुई इंसानियत फिर से ज़िंदा हो उठी। 
"अच्छा रुको!"
"नहीं अब कोई ज़रुरत नही मुझपे एहसान करने की"
"अरे...अच्छा बाबा सॉरी!"
"सॉरी किसलिए ये तुम्हारी बर्थ है"
"ओफ़्फ़ो! तुम तो सचमुच बुरा मान गए! अब कहाँ इस अकेली ट्रेन में सारा टाइम भटकते फिरोगे बैठ जाओ ना!"
"ये अच्छा है! पहले बेइज़्ज़ती करो फिर सॉरी बोलो और फिर ये भी उम्मीद करती हो कि कोई बुरा भी ना माने वाह जी वाह!"
"अब तुम आ रहे हो मेरे साथ या मैं वापस चली जाऊं?"
"आ रहा हूँ ना! मैं जा ही कब रहा था,मुझे पता था तुम कुछ निभाओ ना निभाओ पर अपना मानवता धर्म ज़रूर निभाओगी डॉक्टर जो ठहरी!"
"बाइ गॉड रोहन! बड़े कमीने देखे पर तुम्हारे जैसा कमीना आज तक नहीं देखा!"
"देखोगी भी नहीं,मैं एक ही पीस हूँ ना इसीलिए!"
"हाँ! वो तो नज़र ही आ रहा है!"
"चलो अच्छी बात है इतनी पढ़ाई के बाद भी तुम्हारे चश्मा नही लगा! अच्छा तुम खाने के लिए कुछ लायी हो? मैं जल्दी-जल्दी में रखना भूल गया! "
"अब बर्थ के साथ-साथ  खाना भी शेयर करना पड़ेगा क्या ?"
"ऑफकोर्स करना पड़ेगा मेरी सच्ची दोस्त जो ठहरीं!"
"एक्सक्यूज़ मी! तुम शायद भूल कुछ रहे हो,हमारी दोस्ती उसी वक़्त ख़त्म हो गयी थी जिस दिन तुमने अपने उस सो कॉल्ड अफ़ेयर के बारे में छुपाया था! सो अब हम सिर्फ़ पड़ोसी  हैं बाक़ी संबंध भूल जाओ "
"ओहो प्रिया! छोड़ो भी गढ़े मुर्दे उखाड़ना,अब पूरा सफर लड़ाई में ही गुज़ार दोगी क्या?"
"मुझे तुम्हारे साथ लड़ने में कोई इंट्रेस्ट नहीं है!"
"तो मत लड़ो ना!"
थोड़ी देर की ख़ामोशी के बाद जब वो सीट से उठा तो मुझे जानने की खुजली हुई।
"अब कहाँ जा रहे हो?"
"अपने लिए चाय लेने,तुम्हे पीनी है? तुम्हारे लिए भी लेके आऊँ?"
"नहीं!"
"ओके!"
थोड़ी देर में जब वो वापस आया तो उसके हाथ में चाय के दो डिस्पोज़ल थे।

                                                           'क्रमशः'


Wednesday, 11 December, 2019.

गातांक से आगे:

"ये लो!"
रोहन मुझे चाय देकर बैठते हुए बोला।

"थैंक्स! तो तुम मुंबई क्यूं जा रहे हो?
यहां जॉब रास नहीं आ रही क्या?"

"नहीं!मुझे अभी बहुत कुछ करना है,इतनी सैलरी में मेरा गुज़ारा नहीं हो पाएगा।"

"हुंह! सीधे क्यूं नहीं बोलते कि अपनी सो कॉल्ड महबूबा से शादी करनी है,फ़ालतू में इतना ड्रामा क्यूं?"

"ओहो प्रिया! तुम फिर शुरू हो गईं।घूम फिर कर तुम्हारी सुई मेरे ही पर्सनल मामलों पर आकर क्यूं अटक जाती है?"

"क्यूंकि तुम्हारे इसी पर्सनल मामले ने हमारा सब कुछ तबाह किया है,पूरा प्लान चौपट हो गया,सब खत्म हो गया,कितनों की एजुकेशन,कितनों का फ्यूचर अंधेरे में चला गया।

"ओफोह प्रिया! तुम तो ऐसे बोल रही हो जैसे मेरे एक प्रॉमिस पे ही उन सबका फ्यूचर डिपेंड था।
मै नहीं तोड़ता तो ग्रुप में कोई और तोड़ देता उस प्रॉमिस को। आख़िर तुम कैसे रोक सकती है किसी को उसके दिल की करने से?"

वो गुस्से से खीजते हुए बोला।

उसका ये गुस्सा उस संस्था पे था जिसको हमने 20 21साल की उम्र में बनाया था।उसमे 8-10 साल के वो 7 बच्चे थे जिन्हें हमने अपने शहर में चल रहे चाइल्ड लेबरिंग गैंग से छुटकारा दिलाया था और उनकी एजुकेशन की ज़िम्मेदारी ली थी।
हम 5 दोस्तों ने उस फाउंडेशन को शुरू किया इस वादे के साथ कि अपनी उम्र के 30 वर्ष तक हम विवाह नहीं करेंगे और अगर इस बीच अगर कोई करता भी है तो 35वर्ष पूरे होने तक हम इस संस्था से जुड़े रहेंगे ताकि तब तक वो बच्चे अपने पैरों पर खड़े होने लायक हो जाएं।
4 साल तक तो सब ठीक रहा लेकिन उसके बाद रोहन इस वादे पे ना टिक सका।
एक दिन मैंने उसके फ़ोन पे आने वाली कॉल और मैसेज और फ़ोटो के ज़रिए उसके इस छुपे हुए अफेयर को पकड़ लिया।

"ये सब क्या है रोहन? कौन है ये सृष्टि?"

"ये ग़लत बात है प्रिया! 
तुम ऐसे मेरी पर्सनल चीज़ों को हाथ नहीं लगा सकतीं।"

"बात बदलने की कोशिश मत करो रोहन! ये सब क्या हो रहा है? मै काफ़ी समय से नोटिस भी कर रही हूं,तुम्हारा इंट्रेस्ट भी काम से ख़त्म होता जा रहा है,क्या इसकी वजह यही है?"

मैंने उसे टटोलने की कोशिश की।
उसने बहुत बातें बनाईं लेकिन मैं नहीं मानी,और वो संस्था छोड़ने की ज़िद करने लगा।
बातें बढ़ती गईं,बातों ने झगड़े का रूप ले लिया और उसके पीछे हट जाने के कारण अंत में हमें संस्था बंद करनी पड़ी और उन बच्चों को अनाथालय भेजना पड़ा।
उस घटना के बाद दो वर्षों तक हमारी बात-चीत बंद रही।
एक शहर,एक कॉलोनी में रहते हुए भी मै उसकी शक्ल भी देखना गवारा नहीं करती थी।
चूंकि मैं एक डॉक्टर थी और बचपन से कुछ ज़्यादा ही सोशल थी इसलिए शायद मुझे इस घटना का कुछ ज़्यादा ही दुख हुआ।
अब आज इतने अर्से बाद हमारी बात हुई वो भी इस सिचुएशन में।
तभी मेरा ध्यान टूटा,मैंने देखा वो अपने गुस्से की चरम सीमा पर था।

"तुमने कभी सोचा है तुम्हारी इस सोशल सर्विस से हम लोगों का फ्यूचर क्या होता? ये मानव सेवा के चक्कर में हम सबका कैरियर अंधेरे में आ जाता।
आखि़र ये कैसी कसम थी कि अपनी आयु के 30वर्ष पूरे होने के बाद ही हम शादी करेंगे उससे पहले इसका ख्याल भी नहीं लाएंगे अपने दिमाग़ में ?"

"मैंने कुछ सोच समझकर ही ये कंडीशन रखी थी रोहन,30 साल में तुम कोई बुड्ढे तो नहीं हो जाते,तुम किस समाज में जी रहे हो?"

"उसी समाज में जिस समाज में तुम्हारी उम्र की लड़कियां 2बच्चों की मॉम बन जाती हैं।
हर कोई लड़की तुम्हारी तरह अमीर घराने से नहीं होती,अधिकतर की शादियां कर ही दी जाती है 25 वर्ष पूरे होने तक।जबतक तुम्हारी वो समाज सेवा कर रहा होता तब तक उसकी शादी कहीं और कर दी जाती। उसे खोने के डर के कारण मै ऊब चुका था उस सोशल सर्विस से।"

"हुंह! ये कोई लॉजिक नहीं हुआ।"
मैंने मुंह बनाते हुए बोला।

"तुम क्या जानो किसी को खोने का दर्द क्या होता है,जब कोई दूर हो जाता है ना तो उसे खोने का दर्द इंसान को जीवनभर सताता है।"

"ओहो! अब तुम इन इमोशनल बातों में मुझे मत उलझाओ रोहन! बप्पा जी की सौ! मुझे ज़रा भी इंट्रेस्ट नहीं तुम्हारी इन बातों में।"

कहते हुए मैंने बात को रफ़ा दफा करने की कोशिश की।मुझे भी अब दिलचस्पी नहीं रही इस बारे में बात करने की।
इतने में टीटी आ गया और रोहन को उसकी सीट की कन्फर्मेशन देकर चला गया।

"ओके प्रिया!मै चलता हूं,ज़िंदगी रही तो फिर मिलेंगे।" 
इससे पहले मै कुछ बोलती वो अपना सामान समेटते हुए तेज़ी से चला गया।
मैंने कुछ देर उसकी इस बात के बारे में सोचा लेकिन किसी नतीजे पर ना पहुंचकर आखिरकार मैगज़ीन पढ़ने लगी।
मुंबई पहुंचकर मेरी ड्यूटी वहां एक अच्छे हॉस्पिटल में हो गई,मै उसी में बिज़ी हो गई कि मुंबई में होते हुए भी हमारा कभी मिलना नहीं हो पाया।
काफ़ी अरसा बीत गया 
सबकुछ सामान्य चल रहा था कि एक दिन अचानक एक मॉल में मुझे पीछे से किसी ने आवाज़ दी।

"हे प्रिया!"

मैंने मुड़कर पीछे देखा,आवाज़ देने वाली कोई और नहीं वो सृष्टि थी।

                                             'क्रमशः '

Nayi shuruwat

4 comments:

  1. Awesome story

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  2. Very interesting story please.post full story soon

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  3. Very attractive.
    Please post full story

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  4. यह कहानी दिल को छू जाने वाली है। रोहन और प्रिया के बीच के संवादों में जो तकरार, अपनापन और भावनात्मक जुड़ाव है, वह बहुत ही असली और सहज लगता है। कहानी की शुरुआत दर्द और तनाव से होती है, लेकिन फ्लैशबैक में जाकर जिस तरह दोनों किरदारों के रिश्ते की परतें खुलती हैं, वह बहुत सुंदर ढंग से लिखा गया है। अंत में चाय के दो कप लाना उस न टूटे बंधन का प्रतीक है जो अब भी कहीं अंदर ज़िंदा है। ये कहानी दिखाती है कि रिश्ते झगड़ों के बावजूद भी कैसे टिके रह सकते हैं अगर उनमें थोड़ी सी इंसानियत और अपनापन बचा हो।

    Office Space in Vadodara

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